“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 15 – पुरुषोत्तमयोग

पुरुषोत्तम और संसाररूपी अश्वत्थ वृक्ष का ज्ञान।

श्लोक 15.5

संस्कृत श्लोक

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः |
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्-
गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ||१५-५||
nirmānamohā jitasaṅgadoṣā adhyātmanityā vinivṛttakāmāḥ .
dvandvairvimuktāḥ sukhaduḥkhasaṃjñaira- gacchantyamūḍhāḥ padamavyayaṃ tat ||15-5||

हिंदी अर्थ

।।15.5।। जिनका मान और मोह निवृत्त हो गया है, जिन्होंने संगदोष को जीत लिया है, जो अध्यात्म में स्थित हैं जिनकी कामनाएं निवृत्त हो चुकी हैं और जो सुख-दु:ख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त हो गये हैं, ऐसे सम्मोह रहित ज्ञानीजन उस अव्यय पद को प्राप्त होते हैं।।

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