“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
Home›Chapters›Chapter 16›Shloka 8

अध्याय 16 – दैवासुरसम्पद्विभागयोग

दैवी और आसुरी संपदाओं के गुणों का विवेचन।

श्लोक 16.8

संस्कृत श्लोक

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् |
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ||१६-८||
asatyamapratiṣṭhaṃ te jagadāhuranīśvaram .
aparasparasambhūtaṃ kimanyatkāmahaitukam ||16-8||

हिंदी अर्थ

।।16.8।। वे कहते हैं कि यह जगत् आश्रयरहित, असत्य और ईश्वर रहित है, यह (स्त्रीपुरुष के) परस्पर कामुक संबंध से ही उत्पन्न हुआ है, और (इसका कारण) क्या हो सकता है?

▶ वीडियो (YouTube)

इस श्लोक का वीडियो जोड़ेंWordPress Admin → Gita Shlokas → Shloka 16.8 → YouTube Video URL