“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 3 – कर्मयोग

निष्काम कर्म और कर्तव्यपालन का मार्ग।

श्लोक 3.3

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच |
लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ |
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ||३-३||
śrībhagavānuvāca .
loke.asmina dvividhā niṣṭhā purā proktā mayānagha .
jñānayogena sāṅkhyānāṃ karmayogena yoginām ||3-3||

हिंदी अर्थ

।।3.3।। श्री भगवान् ने कहा हे निष्पाप (अनघ) अर्जुन इस श्लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है ज्ञानियों की (सांख्यानां) ज्ञानयोग से और योगियों की कर्मयोग से।।

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