“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 3 – कर्मयोग

निष्काम कर्म और कर्तव्यपालन का मार्ग।

श्लोक 3.26

संस्कृत श्लोक

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् |
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ||३-२६||
na buddhibhedaṃ janayedajñānāṃ karmasaṅginām .
joṣayetsarvakarmāṇi vidvānyuktaḥ samācaran ||3-26||

हिंदी अर्थ

।।3.26।। ज्ञानी पुरुष, कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे, स्वयं (भक्ति से) युक्त होकर कर्मों का सम्यक् आचरण कर, उनसे भी वैसा ही कराये।।

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