“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 3 – कर्मयोग

निष्काम कर्म और कर्तव्यपालन का मार्ग।

श्लोक 3.13

संस्कृत श्लोक

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः |
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ||३-१३||
yajñaśiṣṭāśinaḥ santo mucyante sarvakilbiṣaiḥ .
bhuñjate te tvaghaṃ pāpā ye pacantyātmakāraṇāt ||3-13||

हिंदी अर्थ

।।3.13।। यज्ञ के अवशिष्ट अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं किन्तु जो लोग केवल स्वयं के लिये ही पकाते हैं वे तो पापों को ही खाते हैं।।

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