“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

दिव्य ज्ञान, कर्म और त्याग के गूढ़ संबंध की व्याख्या।

श्लोक 4.2

संस्कृत श्लोक

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः |
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ||४-२||
evaṃ paramparāprāptamimaṃ rājarṣayo viduḥ .
sa kāleneha mahatā yogo naṣṭaḥ parantapa ||4-2||

हिंदी अर्थ

।।4.2।। इस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुये इस योग को राजर्षियों ने जाना, (परन्तु) हे परन्तप ! वह योग बहुत काल (के अन्तराल) से यहाँ (इस लोक में) नष्टप्राय हो गया।।

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