“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

दिव्य ज्ञान, कर्म और त्याग के गूढ़ संबंध की व्याख्या।

श्लोक 4.4

संस्कृत श्लोक

अर्जुन उवाच |
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः |
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ||४-४||
arjuna uvāca .
aparaṃ bhavato janma paraṃ janma vivasvataḥ .
kathametadvijānīyāṃ tvamādau proktavāniti ||4-4||

हिंदी अर्थ

।।4.4।। अर्जुन ने कहा -- आपका जन्म अपर अर्थात् पश्चात का है और विवस्वान् का जन्म (आपके) पूर्व का है, इसलिये यह मैं कैसे जानूँ कि (सृष्टि के) आदि में आपने (इस योग को) कहा था?

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