“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

दिव्य ज्ञान, कर्म और त्याग के गूढ़ संबंध की व्याख्या।

श्लोक 4.26

संस्कृत श्लोक

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति |
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ||४-२६||
śrotrādīnīndriyāṇyanye saṃyamāgniṣu juhvati .
śabdādīnviṣayānanya indriyāgniṣu juhvati ||4-26||

हिंदी अर्थ

।।4.26।। अन्य (योगीजन) श्रोत्रादिक सब इन्द्रियों को संयमरूप अग्नि में हवन करते हैं,  और अन्य (लोग) शब्दादिक विषयों को इन्द्रियरूप अग्नि में हवन करते हैं।।

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