अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
दिव्य ज्ञान, कर्म और त्याग के गूढ़ संबंध की व्याख्या।
श्लोक 4.8
संस्कृत श्लोक
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् |
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||४-८||
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||४-८||
paritrāṇāya sādhūnāṃ vināśāya ca duṣkṛtām .
dharmasaṃsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge ||4-8||
dharmasaṃsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge ||4-8||
हिंदी अर्थ
।।4.8।। साधु पुरुषों के रक्षण, दुष्कृत्य करने वालों के नाश, तथा धर्म संस्थापना के लिये, मैं प्रत्येक युग में प्रगट होता हूँ।।
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