“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

दिव्य ज्ञान, कर्म और त्याग के गूढ़ संबंध की व्याख्या।

श्लोक 4.39

संस्कृत श्लोक

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः |
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ||४-३९||
śraddhāvā.Nllabhate jñānaṃ tatparaḥ saṃyatendriyaḥ .
jñānaṃ labdhvā parāṃ śāntimacireṇādhigacchati ||4-39||

हिंदी अर्थ

।।4.39।। श्रद्धावान्,  तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है।।

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