अध्याय 15 – पुरुषोत्तमयोग
पुरुषोत्तम और संसाररूपी अश्वत्थ वृक्ष का ज्ञान।
श्लोक 15.10
संस्कृत श्लोक
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् |
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ||१५-१०||
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ||१५-१०||
utkrāmantaṃ sthitaṃ vāpi bhuñjānaṃ vā guṇānvitam .
vimūḍhā nānupaśyanti paśyanti jñānacakṣuṣaḥ ||15-10||
vimūḍhā nānupaśyanti paśyanti jñānacakṣuṣaḥ ||15-10||
हिंदी अर्थ
।।15.10।। शरीर को त्यागते हुये, उसमें स्थित हुये अथवा (विषयों को) भोगते हुये, गुणों से समन्वित आत्मा को विमूढ़ लोग नहीं देखते हैं; (परन्तु) ज्ञानचक्षु वाले पुरुष उसे देखते हैं।।
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