“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 16 – दैवासुरसम्पद्विभागयोग

दैवी और आसुरी संपदाओं के गुणों का विवेचन।

श्लोक 16.14

संस्कृत श्लोक

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि |
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ||१६-१४||
asau mayā hataḥ śatrurhaniṣye cāparānapi .
īśvaro.ahamahaṃ bhogī siddho.ahaṃ balavānsukhī ||16-14||

हिंदी अर्थ

।।16.14।। "यह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया है और दूसरे शत्रुओं को भी मैं मारूंगा", "मैं ईश्वर हूँ और भोगी हूँ", "मैं सिद्ध पुरुष हूँ", "मैं बलवान और सुखी हूँ",।।

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