अध्याय 17 – श्रद्धात्रयविभागयोग
श्रद्धा के सत्त्विक, राजसिक और तामसिक रूप।
श्लोक 17.21
संस्कृत श्लोक
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः |
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ||१७-२१||
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ||१७-२१||
yattu pratyupakārārthaṃ phalamuddiśya vā punaḥ .
dīyate ca parikliṣṭaṃ taddānaṃ rājasaṃ smṛtam ||17-21||
dīyate ca parikliṣṭaṃ taddānaṃ rājasaṃ smṛtam ||17-21||
हिंदी अर्थ
।।17.21।। और जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के उद्देश्य से अथवा फल की कामना रखकर दिया जाता हैं, वह दान राजस माना गया है।।
▶ वीडियो (YouTube)
इस श्लोक का वीडियो जोड़ेंWordPress Admin → Gita Shlokas → Shloka 17.21 → YouTube Video URL
