“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
Home›Chapters›Chapter 17›Shloka 8

अध्याय 17 – श्रद्धात्रयविभागयोग

श्रद्धा के सत्त्विक, राजसिक और तामसिक रूप।

श्लोक 17.8

संस्कृत श्लोक

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः |
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ||१७-८||
āyuḥsattvabalārogyasukhaprītivivardhanāḥ .
rasyāḥ snigdhāḥ sthirā hṛdyā āhārāḥ sāttvikapriyāḥ ||17-8||

हिंदी अर्थ

।।17.8।। आयु, सत्त्व (शुद्धि), बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को प्रवृद्ध करने वाले एवं रसयुक्त, स्निग्ध ( घी आदि की चिकनाई से युक्त) स्थिर तथा मन को प्रसन्न करने वाले आहार अर्थात् भोज्य पदार्थ सात्त्विक पुरुषों को प्रिय होते हैं।।

▶ वीडियो (YouTube)

इस श्लोक का वीडियो जोड़ेंWordPress Admin → Gita Shlokas → Shloka 17.8 → YouTube Video URL