“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 17 – श्रद्धात्रयविभागयोग

श्रद्धा के सत्त्विक, राजसिक और तामसिक रूप।

श्लोक 17.14

संस्कृत श्लोक

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् |
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ||१७-१४||
devadvijaguruprājñapūjanaṃ śaucamārjavam .
brahmacaryamahiṃsā ca śārīraṃ tapa ucyate ||17-14||

हिंदी अर्थ

।।17.14।। देव, द्विज (ब्राह्मण), गुरु और ज्ञानी जनों का पूजन, शौच, आर्जव (सरलता), ब्रह्मचर्य और अहिंसा, यह शरीर संबंधी तप कहा जाता है।।

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