“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 17 – श्रद्धात्रयविभागयोग

श्रद्धा के सत्त्विक, राजसिक और तामसिक रूप।

श्लोक 17.21

संस्कृत श्लोक

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः |
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ||१७-२१||
yattu pratyupakārārthaṃ phalamuddiśya vā punaḥ .
dīyate ca parikliṣṭaṃ taddānaṃ rājasaṃ smṛtam ||17-21||

हिंदी अर्थ

।।17.21।। और जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के उद्देश्य से अथवा फल की कामना रखकर दिया जाता हैं, वह दान राजस माना गया है।।

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