“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 4 – ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

दिव्य ज्ञान, कर्म और त्याग के गूढ़ संबंध की व्याख्या।

श्लोक 4.21

संस्कृत श्लोक

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः |
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||४-२१||
nirāśīryatacittātmā tyaktasarvaparigrahaḥ .
śārīraṃ kevalaṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam ||4-21||

हिंदी अर्थ

।।4.21।। जो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है,  जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है,  ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है।।

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