“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 11 – विश्वरूपदर्शनयोग

भगवान के विराट विश्वरूप का दर्शन।

श्लोक 11.54

संस्कृत श्लोक

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन |
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ||११-५४||
bhaktyā tvananyayā śakya ahamevaṃvidho.arjuna .
jñātuṃ draṣṭuṃ ca tattvena praveṣṭuṃ ca parantapa ||11-54||

हिंदी अर्थ

।।11.54।। परन्तु हे परन्तप अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा मैं तत्त्वत: 'जानने', 'देखने' और 'प्रवेश' करने के लिए (एकी भाव से प्राप्त होने के लिए) भी, शक्य हूँ!।।

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