“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 11 – विश्वरूपदर्शनयोग

भगवान के विराट विश्वरूप का दर्शन।

श्लोक 11.51

संस्कृत श्लोक

अर्जुन उवाच |
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन |
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ||११-५१||
arjuna uvāca .
dṛṣṭvedaṃ mānuṣaṃ rūpaṃ tava saumyaṃ janārdana .
idānīmasmi saṃvṛttaḥ sacetāḥ prakṛtiṃ gataḥ ||11-51||

हिंदी अर्थ

।।11.51।। अर्जुन ने कहा -- हे जनार्दन! आपके इस सौम्य मनुष्य रूप को देखकर अब मैं शांतचित्त हुआ अपने स्वभाव को प्राप्त हो गया हूँ।।

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