“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 11 – विश्वरूपदर्शनयोग

भगवान के विराट विश्वरूप का दर्शन।

श्लोक 11.40

संस्कृत श्लोक

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व |
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ||११-४०||
namaḥ purastādatha pṛṣṭhataste namo.astu te sarvata eva sarva .
anantavīryāmitavikramastvaṃ sarvaṃ samāpnoṣi tato.asi sarvaḥ ||11-40||

हिंदी अर्थ

।।11.40।। हे अनन्तसार्मथ्य वाले भगवन्! आपके लिए अग्रत: और पृष्ठत: नमस्कार है, हे सर्वात्मन्! आपको सब ओर से नमस्कार है। आप अमित विक्रमशाली हैं और आप सबको व्याप्त किये हुए हैं, इससे आप सर्वरूप हैं।।

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