“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 11 – विश्वरूपदर्शनयोग

भगवान के विराट विश्वरूप का दर्शन।

श्लोक 11.5

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच |
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः |
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ||११-५||
śrībhagavānuvāca .
paśya me pārtha rūpāṇi śataśo.atha sahasraśaḥ .
nānāvidhāni divyāni nānāvarṇākṛtīni ca ||11-5||

हिंदी अर्थ

।।11.5।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे पार्थ ! मेरे सैकड़ों तथा सहस्रों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा आकृति वाले दिव्य रूपों को देखो।।

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