अध्याय 11 – विश्वरूपदर्शनयोग
भगवान के विराट विश्वरूप का दर्शन।
श्लोक 11.33
संस्कृत श्लोक
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् |
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||११-३३||
जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् |
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||११-३३||
tasmāttvamuttiṣṭha yaśo labhasva jitvā śatrūn bhuṅkṣva rājyaṃ samṛddham .
mayaivaite nihatāḥ pūrvameva nimittamātraṃ bhava savyasācin ||11-33||
mayaivaite nihatāḥ pūrvameva nimittamātraṃ bhava savyasācin ||11-33||
हिंदी अर्थ
।।11.33।। इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन्! तुम केवल निमित्त ही बनो।।
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