“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 12 – भक्तियोग

भक्ति के स्वरूप और श्रेष्ठ भक्त के गुण।

श्लोक 12.2

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच |
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते |
श्रद्धया परयोपेताः ते मे युक्ततमा मताः ||१२-२||
śrībhagavānuvāca .
mayyāveśya mano ye māṃ nityayuktā upāsate .
śraddhayā parayopetāḥ te me yuktatamā matāḥ ||12-2||

हिंदी अर्थ

।।12.2।। श्रीभगवान् ने कहा -- मुझमें मन को एकाग्र करके नित्ययुक्त हुए जो भक्तजन परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी उपासना करते हैं, वे, मेरे मत से, युक्ततम हैं अर्थात् श्रेष्ठ हैं।।

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