अध्याय 12 – भक्तियोग
भक्ति के स्वरूप और श्रेष्ठ भक्त के गुण।
श्लोक 12.9
संस्कृत श्लोक
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् |
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ||१२-९||
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ||१२-९||
atha cittaṃ samādhātuṃ na śaknoṣi mayi sthiram .
abhyāsayogena tato māmicchāptuṃ dhanañjaya ||12-9||
abhyāsayogena tato māmicchāptuṃ dhanañjaya ||12-9||
हिंदी अर्थ
।।12.9।। हे धनंजय ! यदि तुम अपने मन को मुझमें स्थिर करने में समर्थ नहीं हो, तो अभ्यासयोग के द्वारा तुम मुझे प्राप्त करने की इच्छा (अर्थात् प्रयत्न) करो।।
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