“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 12 – भक्तियोग

भक्ति के स्वरूप और श्रेष्ठ भक्त के गुण।

श्लोक 12.5

संस्कृत श्लोक

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् |
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ||१२-५||
kleśo.adhikatarasteṣāmavyaktāsaktacetasām ||
avyaktā hi gatirduḥkhaṃ dehavadbhiravāpyate ||12-5||

हिंदी अर्थ

।।12.5।। परन्तु उन अव्यक्त में आसक्त हुए चित्त वाले पुरुषों को क्लेश अधिक होता है, क्योंकि देहधारियों से अव्यक्त की गति कठिनाईपूर्वक प्राप्त की जाती है।।

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