“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 12 – भक्तियोग

भक्ति के स्वरूप और श्रेष्ठ भक्त के गुण।

श्लोक 12.8

संस्कृत श्लोक

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय |
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ||१२-८||
mayyeva mana ādhatsva mayi buddhiṃ niveśaya .
nivasiṣyasi mayyeva ata ūrdhvaṃ na saṃśayaḥ ||12-8||

हिंदी अर्थ

।।12.8।। तुम अपने मन और बुद्धि को मुझमें ही स्थिर करो, तदुपरान्त तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं है।।

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