“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 12 – भक्तियोग

भक्ति के स्वरूप और श्रेष्ठ भक्त के गुण।

श्लोक 12.13

संस्कृत श्लोक

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च |
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ||१२-१३||
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca .
nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ||12-13||

हिंदी अर्थ

।।12.13।। भूतमात्र के प्रति जो द्वेषरहित है तथा सबका मित्र तथा करुणावान् है; जो ममता और अहंकार से रहित, सुख और दु:ख में सम और क्षमावान् है।।

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