“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 12 – भक्तियोग

भक्ति के स्वरूप और श्रेष्ठ भक्त के गुण।

श्लोक 12.4

संस्कृत श्लोक

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः |
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ||१२-४||
sanniyamyendriyagrāmaṃ sarvatra samabuddhayaḥ .
te prāpnuvanti māmeva sarvabhūtahite ratāḥ ||12-4||

हिंदी अर्थ

।।12.4।। इन्द्रिय समुदाय को सम्यक् प्रकार से नियमित करके, सर्वत्र समभाव वाले, भूतमात्र के हित में रत वे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।

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