“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 12 – भक्तियोग

भक्ति के स्वरूप और श्रेष्ठ भक्त के गुण।

श्लोक 12.10

संस्कृत श्लोक

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव |
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ||१२-१०||
abhyāse.apyasamartho.asi matkarmaparamo bhava .
madarthamapi karmāṇi kurvansiddhimavāpsyasi ||12-10||

हिंदी अर्थ

।।12.10।। यदि तुम अभ्यास में भी असमर्थ हो तो मत्कर्म परायण बनो; इस प्रकार मेरे लिए कर्मों को करते हुए भी तुम सिद्धि को प्राप्त करोगे।।

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