“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
Home›Chapters›Chapter 12›Shloka 15

अध्याय 12 – भक्तियोग

भक्ति के स्वरूप और श्रेष्ठ भक्त के गुण।

श्लोक 12.15

संस्कृत श्लोक

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः |
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ||१२-१५||
yasmānnodvijate loko lokānnodvijate ca yaḥ .
harṣāmarṣabhayodvegairmukto yaḥ sa ca me priyaḥ ||12-15||

हिंदी अर्थ

।।12.15।। जिससे कोई लोक (अर्थात् जीव, व्यक्ति) उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी व्यक्ति से उद्वेग अनुभव नहीं करता तथा जो हर्ष, अमर्ष (असहिष्णुता) भय और उद्वेगों से मुक्त है,वह भक्त मुझे प्रिय है।।

▶ वीडियो (YouTube)

इस श्लोक का वीडियो जोड़ेंWordPress Admin → Gita Shlokas → Shloka 12.15 → YouTube Video URL