अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और प्रकृति-पुरुष का विवेचन।
श्लोक 13.5
संस्कृत श्लोक
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् |
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ||१३-५||
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ||१३-५||
ṛṣibhirbahudhā gītaṃ chandobhirvividhaiḥ pṛthak .
brahmasūtrapadaiścaiva hetumadbhirviniścitaiḥ ||13-5||
brahmasūtrapadaiścaiva hetumadbhirviniścitaiḥ ||13-5||
हिंदी अर्थ
।।13.5।। (क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के विषय में) ऋषियों द्वारा विभिन्न और विविध छन्दों में बहुत प्रकार से गाया गया है, तथा सम्यक् प्रकार से निश्चित किये हुये युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा (अर्थात् ब्रह्म के सूचक शब्दों द्वारा) भी (वैसे ही कहा गया है)।।
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