“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और प्रकृति-पुरुष का विवेचन।

श्लोक 13.2

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच |
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते |
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ||१३-२||
śrībhagavānuvāca .
idaṃ śarīraṃ kaunteya kṣetramityabhidhīyate .
etadyo vetti taṃ prāhuḥ kṣetrajña iti tadvidaḥ ||13-2||

हिंदी अर्थ

।।13.2।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे कौन्तेय ! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसे तत्त्वज्ञ जन, क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।

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