“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और प्रकृति-पुरुष का विवेचन।

श्लोक 13.29

संस्कृत श्लोक

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् |
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ||१३-२९||
samaṃ paśyanhi sarvatra samavasthitamīśvaram .
na hinastyātmanātmānaṃ tato yāti parāṃ gatim ||13-29||

हिंदी अर्थ

।।13.29।। निश्चय ही, वह पुरुष सर्वत्र सम भाव से स्थित परमेश्वर को समान हुआ आत्मा (स्वयं) के द्वारा आत्मा (स्वयं) का नाश नहीं करता है, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।।

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