“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और प्रकृति-पुरुष का विवेचन।

श्लोक 13.32

संस्कृत श्लोक

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः |
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ||१३-३२||
anāditvānnirguṇatvātparamātmāyamavyayaḥ .
śarīrastho.api kaunteya na karoti na lipyate ||13-32||

हिंदी अर्थ

।।13.32।। हे कौन्तेय ! अनादि और निर्गुण होने से यह परमात्मा अव्यय है। शरीर में स्थित हुआ भी, वस्तुत:, वह न (कर्म) करता है और न (फलों से) लिप्त होता है।।

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