अध्याय 13 – क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ और प्रकृति-पुरुष का विवेचन।
श्लोक 13.35
संस्कृत श्लोक
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा |
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ||१३-३५||
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ||१३-३५||
kṣetrakṣetrajñayorevamantaraṃ jñānacakṣuṣā .
bhūtaprakṛtimokṣaṃ ca ye viduryānti te param ||13-35||
bhūtaprakṛtimokṣaṃ ca ye viduryānti te param ||13-35||
हिंदी अर्थ
।।13.35।। इस प्रकार, जो पुरुष ज्ञानचक्षु के द्वारा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा प्रकृति के विकारों से मोक्ष को जानते हैं, वे परम ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।।
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