“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 7 – ज्ञानविज्ञानयोग

ईश्वर के ज्ञान और अनुभूति का विस्तार।

श्लोक 7.3

संस्कृत श्लोक

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये |
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ||७-३||
manuṣyāṇāṃ sahasreṣu kaścidyatati siddhaye .
yatatāmapi siddhānāṃ kaścinmāṃ vetti tattvataḥ ||7-3||

हिंदी अर्थ

।।7.3।। सहस्रों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य पूर्णत्व की सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्नशील साधकों में भी कोई ही पुरुष मुझे तत्त्व से जानता है।।

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