“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 7 – ज्ञानविज्ञानयोग

ईश्वर के ज्ञान और अनुभूति का विस्तार।

श्लोक 7.7

संस्कृत श्लोक

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय |
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ||७-७||
mattaḥ parataraṃ nānyatkiñcidasti dhanañjaya .
mayi sarvamidaṃ protaṃ sūtre maṇigaṇā iva ||7-7||

हिंदी अर्थ

।।7.7।। हे धनंजय ! मुझसे श्रेष्ठ (परे) अन्य किचिन्मात्र वस्तु नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मुझमें पिरोया हुआ है।।

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