“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
Home›Chapters›Chapter 7›Shloka 4

अध्याय 7 – ज्ञानविज्ञानयोग

ईश्वर के ज्ञान और अनुभूति का विस्तार।

श्लोक 7.4

संस्कृत श्लोक

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च |
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ||७-४||
bhūmirāpo.analo vāyuḥ khaṃ mano buddhireva ca .
ahaṃkāra itīyaṃ me bhinnā prakṛtiraṣṭadhā ||7-4||

हिंदी अर्थ

।।7.4।। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार - यह आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।।

▶ वीडियो (YouTube)

इस श्लोक का वीडियो जोड़ेंWordPress Admin → Gita Shlokas → Shloka 7.4 → YouTube Video URL