“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 7 – ज्ञानविज्ञानयोग

ईश्वर के ज्ञान और अनुभूति का विस्तार।

श्लोक 7.12

संस्कृत श्लोक

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये |
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ||७-१२||
ye caiva sāttvikā bhāvā rājasāstāmasāśca ye .
matta eveti tānviddhi na tvahaṃ teṣu te mayi ||7-12||

हिंदी अर्थ

।।7.12।। जो भी सात्त्विक (शुद्ध), राजसिक (क्रियाशील) और तामसिक (जड़) भाव हैं, उन सबको तुम मेरे से उत्पन्न हुए जानो; तथापि मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं।।

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