“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 7 – ज्ञानविज्ञानयोग

ईश्वर के ज्ञान और अनुभूति का विस्तार।

श्लोक 7.11

संस्कृत श्लोक

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् |
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ||७-११||
balaṃ balavatāṃ cāhaṃ kāmarāgavivarjitam .
dharmāviruddho bhūteṣu kāmo.asmi bharatarṣabha ||7-11||

हिंदी अर्थ

।।7.11।। हे भरत श्रेष्ठ ! मैं बलवानों का कामना तथा आसक्ति से रहित बल हूँ और सब भूतों में धर्म के अविरुद्ध अर्थात् अनुकूल काम हूँ।।

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