“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 7 – ज्ञानविज्ञानयोग

ईश्वर के ज्ञान और अनुभूति का विस्तार।

श्लोक 7.27

संस्कृत श्लोक

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत |
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ||७-२७||
icchādveṣasamutthena dvandvamohena bhārata .
sarvabhūtāni sammohaṃ sarge yānti parantapa ||7-27||

हिंदी अर्थ

।।7.27।। हे परन्तप भारत ! इच्छा और द्वेष से उत्पन्न द्वन्द्वमोह से भूतमात्र उत्पत्ति काल में ही संमोह (अविवेक) को प्राप्त होते हैं।।

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