“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 12 – भक्तियोग

भक्ति के स्वरूप और श्रेष्ठ भक्त के गुण।

श्लोक 12.20

संस्कृत श्लोक

ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते |
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ||१२-२०||
ye tu dharmyāmṛtamidaṃ yathoktaṃ paryupāsate .
śraddadhānā matparamā bhaktāste.atīva me priyāḥ ||12-20||

हिंदी अर्थ

।।12.20।। जो भक्त श्रद्धावान् तथा मुझे ही परम लक्ष्य समझने वाले हैं और इस यथोक्त धर्ममय अमृत का अर्थात् धर्ममय जीवन का पालन करते हैं, वे मुझे अतिशय प्रिय हैं।।

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