“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 8 – अक्षरब्रह्मयोग

अक्षर ब्रह्म और अंतिम स्मरण की महिमा।

श्लोक 8.18

संस्कृत श्लोक

अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे |
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ||८-१८||
avyaktād vyaktayaḥ sarvāḥ prabhavantyaharāgame .
rātryāgame pralīyante tatraivāvyaktasaṃjñake ||8-18||

हिंदी अर्थ

।।8.18।। (ब्रह्माजी के) दिन का उदय होने पर अव्यक्त से (यह) व्यक्त (चराचर जगत्) उत्पन्न होता है; और (ब्रह्माजी की) रात्रि के आगमन पर उसी अव्यक्त में लीन हो जाता है।।

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