“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 8 – अक्षरब्रह्मयोग

अक्षर ब्रह्म और अंतिम स्मरण की महिमा।

श्लोक 8.21

संस्कृत श्लोक

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् |
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ||८-२१||
avyakto.akṣara ityuktastamāhuḥ paramāṃ gatim .
yaṃ prāpya na nivartante taddhāma paramaṃ mama ||8-21||

हिंदी अर्थ

।।8.21।। जो अव्यक्त अक्षर कहा गया है, वही परम गति (लक्ष्य) है। जिसे प्राप्त होकर (साधकगण) पुनः (संसार को) नहीं लौटते, वह मेरा परम धाम है।।

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