“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग

राजविद्या और परम रहस्य स्वरूप भक्ति का ज्ञान।

श्लोक 9.19

संस्कृत श्लोक

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च |
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ||९-१९||
tapāmyahamahaṃ varṣaṃ nigṛhṇāmyutsṛjāmi ca .
amṛtaṃ caiva mṛtyuśca sadasaccāhamarjuna ||9-19||

हिंदी अर्थ

।।9.19।। हे अर्जुन ! मैं ही (सूर्य रूप में) तपता हूँ; मैं वर्षा का निग्रह और उत्सर्जन करता हूँ। मैं ही अमृत और मृत्यु एवं सत् और असत् हूँ।।

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