अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग
राजविद्या और परम रहस्य स्वरूप भक्ति का ज्ञान।
श्लोक 9.31
संस्कृत श्लोक
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति |
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ||९-३१||
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ||९-३१||
kṣipraṃ bhavati dharmātmā śaśvacchāntiṃ nigacchati .
kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśyati ||9-31||
kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśyati ||9-31||
हिंदी अर्थ
।।9.31।। हे कौन्तेय, वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त होता है। तुम निश्चयपूर्वक सत्य जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।।
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