“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग

राजविद्या और परम रहस्य स्वरूप भक्ति का ज्ञान।

श्लोक 9.25

संस्कृत श्लोक

यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः |
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ||९-२५||
yānti devavratā devānpitṝnyānti pitṛvratāḥ .
bhūtāni yānti bhūtejyā yānti madyājino.api mām ||9-25||

हिंदी अर्थ

।।9.25।। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरपूजक पितरों को जाते हैं, भूतों का यजन करने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मुझे पूजने वाले भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।।

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