“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग

राजविद्या और परम रहस्य स्वरूप भक्ति का ज्ञान।

श्लोक 9.15

संस्कृत श्लोक

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते |
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ||९-१५||
jñānayajñena cāpyanye yajanto māmupāsate .
ekatvena pṛthaktvena bahudhā viśvatomukham ||9-15||

हिंदी अर्थ

।।9.15।। कोई मुझे ज्ञानयज्ञ के द्वारा पूजन करते हुए एकत्वभाव से उपासते हैं, कोई पृथक भाव से, कोई बहुत प्रकार से मुझ विराट स्वरूप (विश्वतो मुखम्) को उपासते हैं।।

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