“योगः कर्मसु कौशलम्”
— भगवद्गीता (2.50)
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अध्याय 9 – राजविद्याराजगुह्ययोग

राजविद्या और परम रहस्य स्वरूप भक्ति का ज्ञान।

श्लोक 9.24

संस्कृत श्लोक

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च |
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ||९-२४||
ahaṃ hi sarvayajñānāṃ bhoktā ca prabhureva ca .
na tu māmabhijānanti tattvenātaścyavanti te ||9-24||

हिंदी अर्थ

।।9.24।। क्योंकि सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी मैं ही हूँ, परन्तु वे मुझे तत्त्वत: नहीं जानते हैं, इसलिए वे गिरते हैं, अर्थात् संसार को प्राप्त होते हैं।।

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