अध्याय 14 – गुणत्रयविभागयोग
सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणों का विश्लेषण।
श्लोक 14.2
संस्कृत श्लोक
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः |
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ||१४-२||
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ||१४-२||
idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ .
sarge.api nopajāyante pralaye na vyathanti ca ||14-2||
sarge.api nopajāyante pralaye na vyathanti ca ||14-2||
हिंदी अर्थ
।।14.2।। इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे स्वरूप (सार्धम्यम्) को प्राप्त पुरुष सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते और प्रलयकाल में व्याकुल भी नहीं होते हैं।।
▶ वीडियो (YouTube)
इस श्लोक का वीडियो जोड़ेंWordPress Admin → Gita Shlokas → Shloka 14.2 → YouTube Video URL
